How Peon (चपरासी) Built Billion-Dollar Empire 🔥 Fevicol (Pidilite) | Case Study | Live Hind new story
इंडिया में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां
प डेलाइट के प्रोडक्ट्स यूज ना किए जाते
हो कारपेंटर का फेवरेट फेविकोल हो या फिर
हमारा और आपका पसंदीदा फिक लेकिन क्या
आपको पता है इस इनोवेटिव ब्रांड को शुरू
किया था एक चपरासी ने नाम है बलवंत पारिक
अब वैसे तो आज के टाइम पर इस कंपनी का कोई
स्ट्रांग कंपट ही नहीं है लेकिन जब इस
कंपनी ने फिकल जैसे प्रोडक्ट को लॉन्च
किया था तब कोई भी इसे खरीदने तक को तैयार
नहीं था लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि
पिडीलाइट ने नाना सिर्फ चीजों को जोड़ा
बल्कि हर किसी के दिल में अपनी जगह बना ली
आज के इस इंस्पायरिंग जर्नी में हम सब केछ
बहुत डिटेल में जानने वाले
हैं तो दोस्तों फेविकोल की जर्नी स्टार्ट
होती है 1925 से जब गुजरात के एक छोटे से
गांव महुआ में बलवंत कल्याण जी पारेख का
जन्म हुआ था इनके दादाजी एक म जिस्ट्रेट थे
और उन्हीं से ही इंस्पायर होकर बलवंत
पारेख ने भी लॉ की पढ़ाई करने की सोची और
फिर शुरुआती एजुकेशन कंप्लीट कर करने के
बाद उन्होंने मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज
में एडमिशन ले लिया लेकिन दोस्तों यह व
टाइम था जब देश पर ब्रिटिश रूल था और हर
तरफ लोगों के ऊपर अत्याचार किए जा रहे थे
जिसकी वजह से हर देशभक्त के खून में आजादी
इस लड़ाई में कूद गए उन्होंने जैसे ही
सुना कि महात्मा गांधी क्विट इंडिया
मूवमेंट की शुरुआत कर रहे हैं तो फिर वह
पढ़ाई बीच में ही छोड़कर अपने गांव वापस आ
गए और इस आंदोलन को जवाइन कर लिया लेकिन
करीब 1 साल बाद उनके मन में यह ख्याल आया
कि अगर वह किसी हाईयर पोजीशन पर होंे तो
फिर अपने लोगों के लिए ज्यादा काम आ
पाएंगे और फिर इसी सोच के साथ बलवंत पारेख
मुंबई वापस आए और अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू
कर दी लेकिन दोस्तों पढ़ाई के दौरान ही
उनकी शादी कांता बहन से हो गई और फिर शादी
के बाद अपनी रिस्पांसिबिलिटीज को निभाने
के लिए उन्होंने कई सारे छोटे-मोटे जॉब्सकी लहर दौड़ने लगी और फिर बलवंत पारक
किए लेकिन महीना भर मेहनत करने के बाद जो
पैसा मिलता था उससे घर की बेसिक नीट्स ही
पूरी नहीं हो पा रही थी पर फिर भी
उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार अपनी
ग्रेजुएशन कंप्लीट कर ली इसके बाद से
कांता बहन को लगने लगा कि शायद अब उनके
फैमिली का जीवन पटरी पर आ जाएगा लेकिन
जल्द ही उनका यह सपना भी टूट गया क्योंकि
बलवंत पारेख ने डिसाइड किया कि वह कभी भी
वकालत को अपना प्रोफेशन नहीं बनाएंगे इसकी
वजह यह थी कि पढ़ाई के दौरान ही उन्हें यह
समझ आ गया था कि यह प्रोफेशन बिना झूठ के
सहारे नहीं चल सकता है और यह उनके वैल्यूज
और एथिक्स के खिलाफ था इसके बाद उन्होंने
और एथिक्स के खिलाफ था इसके बाद उन्होंने
दूसरा काम ढूंढना शुरू किया और एक लकड़ी
के व्यापारी के ऑफिस में चपरासी की नौकरी
करने लगी लेकिन दोस्तों यहां भी उनकी
फाइनेंशियल कंडीशन बहुत खराब थी हालात तो
ऐसी हो गई थी कि उन्हें और उनकी वाइफ को
उसी लकड़ी के गोदाम में ही रहना पड़ा
लेकिन दोस्तों लकडी के गोदाम में काम
करते हुए ही उन्होंने एक मार्केट गैप
नोटिस किया जो कि आगे चलकर उनके बिजनेस की
फाउंडेशन बनी उन्होंने देखा कि वुड
इंडस्ट्री में ग्लू की बहुत ज्यादा डिमांड
है लेकिन मार्केट में अवेलेबल ज्यादातर
गोंद इंपोर्टेड होते थे जो ना सिर्फ महंगे
थे बल्कि इसकी क्वालिटी भी कुछ खास अच्छी
नहीं थी जबकि अगर हम इसके सस्ते
अल्टरनेटिव की बात करें तो उस समय लोग
चावल या आटे को पकाकर बनाए गए गोंद का
इस्तेमाल करते थे अब यह गोंद पेपर जैसी
हल्की चीजों को तो चिपका देता था लेकिन
लकड़ी जैसे भारी सामानों के लिए यह
बिल्कुल काम का नहीं था इसीलिए उस समय के
ज्यादातर कार्पेंटर्स एक स्पेशल टाइप के
गोंद का यूज किया करते थे जो कि जानवरों
की हड्डी और खाल से निकाले गए कॉलेजन से
बनाया जाता था अब यह कुछ हद तक टिकाऊ तो
होता था लेकिन ने इसे बनाने और यूज करने
का प्रोसेस काफी मुश्किल और टाइम कंजूमिंग
था क्योंकि जितनी बार आपको इसे इस्तेमाल
करना है उतनी ही बार इसे गर्म करना पड़ता
था साथ ही डसके अंदर से इतनी गंदी बदबू
आती थी ना कि काम करना भी मुश्किल हो जाता
और फिर जो कारीगर प्योर वेजिटेरियन थे
उनके लिए जानवरों की हड्डियों से बना गोंद
इस्तेमाल करना उनका धर्म भ्रष्ट करने के
जैसा था और फिर इन्हीं सभी प्रॉब्लम्स को
देखते हुए बलवंत पारेख ने सोचा कि क्यों
ना कोई ऐसा गोंद बनाया जाए जो कि इजी टू
यूज हो :ंग हो और हाइजेनिक भी लेकिन
दोस्तों यह काम इतना आसान नहीं था क्योंकि
प्रोडक्ट पर रिसर्च करने और
मैन्युफैक्चरिंग यूनिट सेटअप करने में
बहुत बड़े फंड्स की जरूरत थी जो कि उस
टाइम बलवंत के पास में नहीं थे लेकिन इसी
बीच बलवंत पारक की मुलाकात मोहन नाम के एक
इन्वेस्टर से हुई और फिर दोनों ने मिलकर
कोई बिजनेस शुरू करने का फैसला किया थोड़ा
दिमाग लगाने के बाद से 1950 में उन्होंने
बाहर के देशों से साइकिल्स सुपारी
केमिकल्स और डाइज इंपोर्ट करके इंडिया में
बेचना शुरू कर दिया इस बिजनेस से उ्हें
काफी अच्छा प्रॉफिट हुआ जिसकी वजह से
धीरे-धीरे करके उनकी फाइनेंशियल कंडीशन
इंप्रूव होने लगी और फिर जल्द ही बलवंत
पारेख अपनी फैमिली के साथ मुंबई के सायन
इलाके में एक छोटे लेकिन कंफर्टेबल फ्लैटमें शिफ्ट हो गए लेकिन दोस्तों अब शुरू
होती है उनकी असली कहानी बलवंत पारेख ने
'केमिकल्स और डाइस के बिजनेस में गहराई से
काम करना शरू कर दिया और इसके लिए
शुरू
उन्होंने जर्मनी के एक कंपनी फेडको के साथ
में पार्टनरशिप कर ली हालांकि फेडको खुद
केमिकल्स के मैन्युफैक्चरर नहीं थी यह
जर्मनी की एक बड़ी कंपनी चेस्ट के लिए
मिडल मैन का काम करती थी मतलब कि हचस
केमिकल बनाकर फेडको को देती और फिर फेडको
उन्हें बलवंत पारेख को सप्लाई करता था अब
1950 में भारत के टेक्सटाइल इंडस्ट्री
काफी तेजी से ग्रो कर रही थी इसीलिए डाइज
और केमिकल्स की डिमांड भी बहुत ज्यादा बढ़़गई और फिर इसी बढ़ती डिमांड के चलते हचस
ने इंडियन मार्केट से खूब प्रॉफिट कमाया
इस सक्सेस से इंप्रेस होकर 1954 में हचस
के मैनेजिंग डायरेक्टर ने बलवंत पारेख को
जर्मनी आने का इन्विटेशन दिया और फिर
पारेख जर्मनी जाकर 1 महीने तक रहे और वहां
की एडवांस टेकनोलॉजी और प्रोडक्शन के
प्रोसेस को बहुत गहराई से समझा इसी टाइम
उन्होंने देखा कि हचस एक खास किस्म का
गोंद बना रही थी जिसका नाम था मोवी कोल यह
ग्लूलकड़ी के कई सारी चीजों को जोडने के
लिए यूज़ किया जाता था जो कि टिकाव तो था
ही लेकिन इसे यूज़ करना भी काफी आसान था
यानी कि इसे ना तो गर्म करना पड़ता था और
ना ही जानवरों वाले ग्लू की तरह इसे घंटों
पकाना पड़ता था लेकिन प्रॉब्लम यह थी कि
अगर बलवंत इस गोंद को भारत में इंपोर्ट
करते तो इसका प्राइस बहुत ज्यादा बढ़ जाता
जिसे कि गरीब कारीगर अफोर्ड नहीं कर पाते
और प्रॉब्लम वहीं की वहीं रह जाती ऐसे में
उन्होंने सोचा कि क्यों ना अपने उस सपने
पर काम किया जाए जो उन्होंने कई सालों
पहले देखा था यानी कि भारत में ही खुद का
ऐसा गोंद बनाना जो कि ना सिर्फ किफायती हो
बल्कि यहां के अलग-अलग मौसम के लिए सूटेबल
भी हो इसी सोच के साथ उन्होंने जर्मनी में
मोवी कोल को बनाने के प्रोसेस को बहुत
बारीकी से समझना शुरू किया और फिर भारतवापस लौटकर अपने भाई सुनील पारेख के साथ
मिलकर इस तरह के ग्लो को तैयार करने में
जुट गए 1954 में उन्होंने मुंबई के जैकब
सर्कल में एक छोटी सी फैक्ट्री लगाई और
अपनी कंपनी का नाम रखा पारक डकम
इंडस्ट्रीज इसके बाद उन्होंने हचस से सीखी
टेवक्निक का यूज करते हुए भारत के लिए एक
नया और स्वदेशी गोंद तैयार किया जिसका नाम
रखा गया फेवीकोल यह नाम बेसिकली मोवी कोल
से इंस्पायर्ड था जिसमें कोल का मतलब था
दो चीजों को जोड़ने वाला 1959 में बलवंत
पारेख ने फेविकोल को मार्केट में उतारा और
फिर इसी साल उन्होंने अपनी कंपनी का नाम
बदलकर पारक डाईकेम इंड्ट्रीज से पिडीलाइटइंडस्ट्रीज कर दिया शुरुआत में फेवीकोल को
टेबल टॉप ग्लू के रूप में प्रमोट किया गया
जो कि स्पेशली फर्ीचर इंडस्ट्री के लिए
एक परफक्ट सलूशन था लेकिन यह बात लोगों
को समझाना कंपनी के लिए बहुत मुश्किल होने
लगा क्योंकि ज्यादातर कार्पेटर्स और
कारीगर ट्रेडिशनल ग्लूका इस्तेमाल करने
के आदि हो चुके थे और उनका मानना था कि यह
नए टाइप का ग्लू उनके ट्रेडिशनल ग्लू के
जितना इफेक्टिव नहीं होगा दूसरी तरफ बड़े
कांट्रैक्ट्स और अमीर कस्टमर्स इंपोरटेड
एडि सिप्स को ही प्रीमियम क्वालिटी का
प्रोडक्ट मानते थे और फिकल को एक लोकल और
सस्ता प्रोडक्ट समझकर नजरअंदाज कर देते थेअब क्योंकि पिडीलाइट के पास उस समय बहुत
लिमिटेड रिसोर्सेस थे इसीलिए बड़े लेवल पर
टीवी या रेडियो एड्स करना पॉसिबल नहीं था
ऐसे में बलवंत पारेख ने एक नया तरीका
अपनाया और ग्राउंड लेवल पर काम करना शुरू
किया वह छोटे दुकानदारों और कारीगरों से
पर्सनली मिले फेविकोल के फायदे समझाए और
कापेटर्स को इसे यूज़ करने के लिए
अवेयर किया साथ ही इसके छोटे-छोटे पैक्स
को भी लॉन्च किया गया ताकि कम से कम बजट
में भी लोग डसे खरीद सकें लेकिन दोस्तों
इन सभी शुरुआती प्रयासों से भी कंपनी को
कुछ खास फायदा नहीं मिल पाया हालांकि इसके
बाद भी बलवंत पारेख ने हार नहीं मानी औरउन्होंने कार्पेट्स के लिए डेमोंस्ट्रेट
वर्कशॉप्स कराई इन वर्कशॉप में उन्होंने
फेविकोल का इस्तेमाल करके दिखाया और
समझाया कि उनका यह ग्लो पुराने ट्रेडिशनल
ग्लो से ज्यादा ड्यूरेबल और स्ट्रंग है
फेविकोल का सबसे बड़ा फायदा यह था कि इसे
इस्तेमाल करना बहुत आसान था ना इसे गर्म
करने की जरूरत थी और ना ही कोई बदबू की
समस्या और यह सिंथेटिक रेजिन से बनाया गया
था जो कि वेजिटेरियन लोगों के लिए एक सेफ
ऑप्शन था बलवंत पारक ने कार्पेंटर्स को
फेविकोल के फ्री सैंपल्स भी दिए ताकि वह
खुद इसे ट्राई कर सकें और फिर जब उन्होंने
ने इस ग्लूको ट्राई किया तो मानो हैरानही रह गए क्योंकि फेविकोल की स्मूथ
कंसिस्टेंसी ने काम को काफी आसान बना दिया
और यह सरफेस पर मक्खन की तरह ग्लाइड करता
था इस तरह से फेविकोल अब धीरे-धीरे
मार्केट में पॉपुलर होने लगा लेकिन
दोस्तों प्रॉब्लम यहीं पर खत्म नहीं हुई
क्योंकि फेविकोल का शुरुआती फार्मूला
सिर्फ लकड़ी पर ठीक तरीके से काम करता था
प्लास्टिक और मेटल जैसे चिकने सरफेस पर
फेविकोल फेल हो जाता था इसके अलावा भारत
में जब ज्यादा गर्मी पड़ती थी उस टाइम पर
भी यह अच्छी तर तरीके से काम नहीं कर पाता
था ऐसे में बलवंत पारेख ने सोचा कि अगर
फेविकोल को एक रिलायबल और यूनिवर्सल एडिसबनाना है तो उसके स्टेबिलिटी और वर्सटाइल
को इंप्रूव करना होगा और फिर उन्होंने इस
चैलेंज को एक्सेप्ट करते हुए आर एनडी
डिपार्टमेंट की नीव रखी और उसमें काफी
सारा पैसा इन्वेस्ट किया उन्होंने अलग-अलग
कार्पेटर्स और ग्राहकों से फीडबैक लिया
और फिर इन फीडबैक्स के आधार पर फिकल के
फार्मूला को ना केवल पहले से बेहतर बनाया
बल्कि अलग-अलग जरूरतों को पूरा करने के
लिए डसके कई सारे नए-नए वेरिएंट्स भी
डेवलप किए गए एग्जांपल के लिए 1980 के
टाइम जब कंपनी को शिकायत मिलने लगी कि
ज्यादा ह्यूमिडिटी की वजह से उनके गोंद की
पकड़ कमजोर पड़ जाती है तो फिर पडलाइटइस प्रॉब्लम को सॉल्व करने के लिए फेबल
एमआर लॉन्च किया जो कि मॉइश्वर को रोककर
जॉइंट्स को स्टेबल बनाए रखता था इसी तरह
से 1985 में कंपनी ने एक और इनोवेटिव
प्रोडक्ट लॉन्च किया जो था असल में उस
टाइम पर कार्पेंटर्स और आम लोगों को एक
ऐसे प्रोडक्ट की जरूरत थी जो कि क्विक
रिजल्ट दे पाए और फिर पडलाइट ने इस
प्रॉब्लम को देखते हुए बस एक बूंद स्लोगन
के साथ में फेविक्विक को मार्केट में उतार
यस
सर f क्विक एडेसिन भर लगे चुटकी में
चिपकाए फेविक्विक की खासियत यह थी कि यह
सिर्फ लकड़ी ही नहीं बल्कि प्लास्टिक मेटलरबर और दूसरे मटेरियल को भी तुरंत जोड़
देता था और फिर आगे चलकर भी डॉक्टर
फिक्सिट एसिल टेक्स और मरीन जैसे
प्रोडक्ट्स लॉन्च किए गए और फिर इतने सारे
मार्केट डिमांड को फुलफिल करने का ही
नतीजा है कि आज पीडी लाइट इंडियन एडसी
मार्केट का 70 पर से भी ज्यादा शेयर होल्ड
करता है बलवंत पारेख ने बहुत पहले ही यह
समझ लिया था कि फर्नीचर में कौन सा ग्लू
लगेगा यह डिसीजन अक्सर कार्पेटर्स ही
लेते हैं इसीलिए उन्होंने आम जनता को
टारगेट करने की बजाय कार्पेटर्स और
कांट्रैक्टर्स पर फोकस किया इस डायरेक्ट
कनेकशन को मजबूत बनाने के लिए उन्होंनेदिसंबर 2002 में फेविकोल चैंपियंस क्लब
यानी कि एफसीसी की शुरुआत की एफसीसी का
मकसद कार्पेंटर्स और काट्रैक्टर्सं को
फिकल के अलग-अलग प्रोडक्ट्स को कब कहां और
कैसे यूज करना है उसकी प्रैक्टिकल
ट्रेनिंग देना था आज एफसीसी के 14५ शहरों
में 300 से भी ज्यादा क्लब्स हैं जिनसे कि
40000 का्ेंट्स जुड़े हुए हैं लेकिन
दोस्तों पारक जी ने अपने प्रोडक्ट्स को
सिर्फ कार्पेटर्स तक सीमित नहीं रखा
बल्कि ग्लू के छोटे पैक्स निकालकर बच्चों
के स्कूल प्रोजेक्ट से लेकर उनके आर्टएंड
क्राफ्ट तक भी अपनी एक खास जगह बना ली इस
तरह से पिडीलाइट की शानदार सक्सेस और फिकलकी जबरदस्त पॉपुलर ने उसे इंडियन मार्केट
के हर एक घर में अपनी जगह तो दिला दी
लेकिन इसके बाद कंपनी के सामने एक नई
दिक्कत खड़ी हो गईं फेक प्रोडक्ट्स की
एक्चुअली मार्केट में फेविकोल जैसे दिखने
वाले घटिया क्वालिटी के फेक ग्लो बिकने
लगे क्योंकि ज्यादातर लोग सिर्फ डिब्बे का
डिजाइन लोगो और ब्रांड नेम देखकर इसे खरीद
लेते थे और फिर स्कैमर्स ने इस बात का
फायदा उठाना शुरू कर दिया हालांकि जल्द ही
पिडीलाइट ने इसे सीरियसली लिया और एकशन
में आ गई उन्होंने फिकल के डिब्बों को
यूनिक बनाया अवेयरनेस कैंपेन चलाए और असली
फिकल की पहचान जैसे लोगो होलोग्राम औरक्यूआर चेक करने के तरीके बताए साथ ही
नकली प्रोडक्ट्स बेचने वालों के खिलाफ
लीगल एक्शन लिया गया और उनके ऑपरेशंस बंद
कराए गए और दोस्तों इन सभी प्रयासों से
नकली प्रोडक्ट की मार्केट कम हुई और फिकल
पर कस्टमर्स का भरोसा वापस आ गया और
दोस्तों पलाडट ने फिकल को एक हाउसहोल्ड
नेम बनाने के लिए क्रिएटिव मार्केटिंग का
भी बेहतरीन इस्तेमाल किया सबसे खास बात यह
है कि फेविकोल के विज्ञापनों में कभी भी
बड़े सेलिब्रिटीज का सहारा नहीं लिया गया
इसके बजाय इनके एड्स में साधारण गांव का
बैकग्राउंड और आम जनता जैसे रिलेटेबल
कैरेक्टर्स को दिखाया गया कई बार तो कंपनीने अपने रियल कारपेटर्स को भी ऐड कैंपेन
में शामिल किया ताकि फेवी गल का जुड़ाव
सीधे उन लोगों से हो सके जो कि इसे
रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल करते हैं
फेविकोल की आइकॉनिक टैगलाइन दम लगा के
हैशा आज भी लोगों के
यह फिकल मरीन का मजबूत जोड़ है पानी में
भी नहीं टूटेगा इसी तरह शर्मा के
दुल्हनिया जैसे ड कैंपेन से कस्टमर्स
फेविकोल से इमोशनली कनेक्ट हो
गए पड़ ग नाम सर माइन का सोफा हाय रेसर
माइन का
सोफा फिकल के मार्केटिंग कैंपेन मेंह्यूमर का खास रोल रहा है का वो ओवर
क्राउडेड बस वाला ऐड आपको याद है जिसमें
लोग बस के अंदर और बाहर तक चिपके हुए नजर
आते हैं इस बात का यह बहुत परफेक्ट
एग्जांपल है कि कैसे मजेदार अंदाज में भी
प्रोडक्ट की स्ट्रें को हाईलाइट किया जा
सकता
है यहां तक कि फ्री गिफ्ट स्टोर कैंपेन ने
भी फेविकोल की ताकत को इतने क्रिएटिव
तरीके से पेश किया कि यह ना केवल दर्शकों
को हंसाने में कामयाब रहा बल्कि प्रोडक्ट
की रिलायबिलिटी को भी बखूबी शोकेस किया
इस सबके अलावा पीडी लाइट की एक और खास
स्ट्रेटजी यह थी कि उन्होंने अपने कंपटीशनको कभी वेपन अपने नहीं दिया जब भी कोई
कंपनी फिकल को कंपट करने की ट्राई करती तो
पिडीलाइट उसे एक अच्छा ऑफर देकर एक्वायर
कर लेती थी जैसे कि साल 2000 में इसने
एमसील और मिस्टर फिक्ड को एक्वायर कर लिया
तो वहीं 2004 में रॉफ और 2010 में वुडलॉक
को लेकिन दोस्तों
नेटली 25 जनवरी 2013 को फेवीकोल मैन के
नाम से फेमस बलवंत पारेख ने 88 साल की
उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया
फिलहाल अगर आज की बात करें तो बलवंत पारेख
की विरासत को आज उनके बेटे मधुकर पारेख और
अजय पारेख पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ा
रहे हैं और उनके विजन और डेडिकेशन ने पिडीलाइ
इंडस्ट्रीज को एक नई ऊंचाइयों तक
पहुंचा दिया है आज पिडीलाइट के प्रोडक्ट्स
80 से भी ज्यादा देशों में आपको मिल
जाएंगे साथ ही बांग्लादेश ब्राजील इजिप्ट
केनिया लंका थाईलैंड यूए्ड और यूएसए जैसे
कई सारे देशों में इसने अपनी एडवांस
मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी भी सेट अप कर ली
है आज पडलाइट फैमिली की नेट वर्थ 14.6
बिलियन डॉलर है और वह फस इंडिया रिचेस्ट
लिस्ट में 17वें नंबर पर आते हैं तो
दोस्तों अंत में बस में यही कहना चाहता
हूं कि पिडीलाइट की सक्सेस ने हमें सिखाया
कि मेहनत इनोवेशन और सही मार्केटिंग
स्ट्रेजी से कोई भी ब्रांड लोगों केदिलों में अपनी जगह बना सकता
है हम
Thanks

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